रविवार, 12 मई 2024

जारुल के फूल

तेरे अश्क़ में गुलाबी बैगनी होता जारुल के फूल
तेरे लबों से सुर्ख़ रंग चुराता ये गुलमोहर के फूल

बादे नसीम ने दस्तक़ दी वैसाख की एकसुबह में 
राहों में तेरा मिलना फिर से निराला एक कौतूहल

दोस्ती के रंग को तुमने ही पीला बनाया था शायद
जैसे इन हरी हरी पत्तियों के बीच इठलाता कनैल

तुम्हारी यादें अब भी झांकती है इन फ़ज़ाओं में 
जैसे तेरी जूलफों से रंग चुराता ये नशीले बादल

फिर से ज़र्द लिबास में लिपटे सोनाली के शज़र 
दमकता तेरा रुख़सार जैसे आफ़ताब का जमाल


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें