तेरे अश्क़ में गुलाबी बैगनी होता जारुल के फूल
तेरे लबों से सुर्ख़ रंग चुराता ये गुलमोहर के फूल
बादे नसीम ने दस्तक़ दी वैसाख की एकसुबह में
राहों में तेरा मिलना फिर से निराला एक कौतूहल
दोस्ती के रंग को तुमने ही पीला बनाया था शायद
जैसे इन हरी हरी पत्तियों के बीच इठलाता कनैल
तुम्हारी यादें अब भी झांकती है इन फ़ज़ाओं में
जैसे तेरी जूलफों से रंग चुराता ये नशीले बादल
फिर से ज़र्द लिबास में लिपटे सोनाली के शज़र
दमकता तेरा रुख़सार जैसे आफ़ताब का जमाल
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