दिन महीने साल अब फिर से गुजरने लगे हैं
अव्वाम अपने हाल को आम समझने लगे हैं।
अव्वाम अपने हाल को आम समझने लगे हैं।
मानसून के बाद दरख़्तों का रंग फिर सब्ज़ हुए
कुकुरमुत्ते फ़िर से अपने वज़ूद तलाशने लगे हैं।
इंतखाब के एलान के बाद उन्हें वायदें याद हुए
नुमाईदें फिर से अपने इलाकों में घूमने लगे हैं।
बन बैठे थे वो मालिक फिर गुरूर काफूर हुए
दर दर की ख़ाक छान पसीने में तरने लगे हैं।
ना असूल ना हया रहा रूतबा इनके दीन हुए
वो गिरगिट की तरह फिर रंग बदलने लगे हैं।
मजलिस में जाना अब इनके मजहब इमां हुए
परिंदे इस डाल से उस डाल पे उछलने लगे हैं
न कोई मुल्ज़िम रहा मुजरिम भी आजाद हुए
इस चुनावी जंग में जन अदालत सजने लगे हैं
गंगा-कोशी के हम्माम में दागी भी बेदाग हुए
ग़फ़लत में शहाब क्यों चुनाव यूँ ही होने लगे है
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