सरहदों के
पार भी अपना मुखतलिफ़ निशाँ होता है
हाथ खाली
हो फिर भी वहां एक अपना ज़ुबाँ होता है
जीते -मरते
है रोज दर रोज बगैर तमगों की आस में
अफ्रीका,अमेरिका
या जहां भी हमारा मकाँ होता है
हम हिन्दुस्तानियों
के नुमाईन्दे हैं आलमी सतह पर
कौमी मुफाद
के लिए हमारा हर लम्हा रवाँ होता है
तिरंगा के
साये में बनता हमारा मजहब व तहज़ीब
ये जज़्बात
महफ़िल में हमारे आँखों से बयाँ होता है
हिन्द हमारे
रगों और लबों में हरदम हर मजलिस में
कातिब से
सफ़ीर तलक का सफ़र यूँ जवाँ होता है
हाथ खाली हो फिर भी वहां एक अपना ज़ुबाँ होता है
जीते -मरते है रोज दर रोज बगैर तमगों की आस में
अफ्रीका,अमेरिका या जहां भी हमारा मकाँ होता है
हम हिन्दुस्तानियों के नुमाईन्दे हैं आलमी सतह पर
कौमी मुफाद के लिए हमारा हर लम्हा रवाँ होता है
तिरंगा के साये में बनता हमारा मजहब व तहज़ीब
ये जज़्बात महफ़िल में हमारे आँखों से बयाँ होता है
हिन्द हमारे रगों और लबों में हरदम हर मजलिस में
कातिब से सफ़ीर तलक का सफ़र यूँ जवाँ होता है
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