सोमवार, 28 सितंबर 2020

हमारी आशनाई

आने से उनके ये जर्द सुबह नूरानी हो गयी है
उनसे मिलके सिंदूरी शाम सुहानी हो गयी है
 
जैसे ग़ज़लों में काफिया से आ आती है जान
लबों के खुलते ही फ़िज़ाएं तरानी हो गयी है
 
जैसे बहारों में खिलते हैं शज़र में सब्ज पत्ते
तुम्हारे आने से अब ये मंज़र धानी हो गयी है
 
जैसे जुदा हो जाते हैं शाखों से पत्ते खिजां में
तेरे जाने से अब दिन भी शबानी हो गयी है
 
जैसे परवाने जल जाते है शमा के आगोश में
हमारी आशनाई भी एक कहानी हो गयी है

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