आने से उनके
ये जर्द सुबह नूरानी हो गयी है
उनसे मिलके सिंदूरी शाम सुहानी हो गयी है
जैसे ग़ज़लों
में काफिया से आ आती है जान
लबों के खुलते ही फ़िज़ाएं तरानी हो गयी है
जैसे बहारों
में खिलते हैं शज़र में सब्ज पत्ते
तुम्हारे आने से अब ये मंज़र धानी हो गयी है
जैसे जुदा
हो जाते हैं शाखों से पत्ते खिजां में
तेरे जाने से अब दिन भी शबानी हो गयी है
जैसे परवाने
जल जाते है शमा के आगोश में
हमारी आशनाई भी एक कहानी हो गयी है
उनसे मिलके सिंदूरी शाम सुहानी हो गयी है
लबों के खुलते ही फ़िज़ाएं तरानी हो गयी है
तुम्हारे आने से अब ये मंज़र धानी हो गयी है
तेरे जाने से अब दिन भी शबानी हो गयी है
हमारी आशनाई भी एक कहानी हो गयी है
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