शायद मैं चन्द अल्फाज़ हूँ मेरा कोई मकां नहीं
फैल जाता हूँ स्याही की तरह जिसकी इंतहां नहीं
फैल जाता हूँ स्याही की तरह जिसकी इंतहां नहीं
कितने नायाब हरफ़ सजा रखें अपनी गुलशन में
कैसे बताऊं इसे अपने रूप का कोई गुमां नहीं
धीरे धीरे मेरा वजूद घुल जाता हैं इन्हीं फजाओं में
मेरे सिम्त की कोई सरहद नहीं कोई निशान नहीं
किसके जानिब अपनी अल्फ़ाज़ों का रूख करूँ
जिसकी मुक़्क़मल जमीन नहीं कोई आसमां नहीं
मरासिम है हिंदवी से कभी रेख़्ता से कभी उर्दू से
इन चंद अशआर के सीवा मेरी कोई ज़ुबान नहीं
भटकता हूँ कभी गंगा कभी सिंधु के वादिओं में
बेपनाह तिश्नगी का अनवरत सफर आसान नहीं