विरहों के अग्नि में लपटी है वर्षों से मेरी काया
दादुर ताल लगाए सांवरिया सावनी रस घोल दो
माघ की शीत वसन में सिमटी है तेरी माया
कोयल कुहुँ बोले सांवरिया बसंती रंग घोल दो
अंधियारी दिवा में बिलखती है तेरी किशलया
पपीहरा पीयूँ पुकारे सांवरिया अधर पट खोल दो
मधुर मिलन की आस में तरसती है तेरी छाया
भँवरे गुं गुं पुकारती सांवरिया प्रेम गीत मोल दो
तीव्र सप्तक लय में थिरकती है तेरी सौम्या
घुँघरू झनन बाजे सांवरिया पंचम भाषा बोल दो
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