शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

सांवरिया

विरहों के अग्नि में लपटी है वर्षों से मेरी काया
दादुर ताल लगाए सांवरिया सावनी रस घोल दो

माघ की शीत वसन में सिमटी है तेरी माया
कोयल कुहुँ बोले  सांवरिया बसंती रंग  घोल दो

अंधियारी दिवा में बिलखती है तेरी किशलया
पपीहरा पीयूँ  पुकारे सांवरिया अधर पट खोल दो

मधुर मिलन की आस में तरसती है तेरी छाया
भँवरे गुं गुं पुकारती सांवरिया प्रेम गीत मोल दो

तीव्र सप्तक   लय में थिरकती है तेरी सौम्या

घुँघरू झनन बाजे  सांवरिया पंचम भाषा बोल दो

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