मंगलवार, 24 सितंबर 2019

अफ़साने

मुख्तलिफ थी कल तक हमारे अफ़साने अब वो तमाम देखते हैं
कल तक चश्में जुस्तजू थी दो  दिलों की अब वो अवाम देखते है

सहर से शामे तलक सीने में उभरता रहा आशना-ए-रोशनाई 
सुर्ख हुए चश्म-ए-समंदर की गहराई, अब वो कलाम देखते हैं



जन्नत की खातिर तिनका तिनका बिखेरा उम्र भर  गुलिश्तां में 
दो गज़ का नशेमन बनाऊं कैसे जान अब  वो क़याम देखते है

अबीर की खवाहिश लिए लूटा दी बहार-ए-गुलशन की खुशबू
खिजां का दौर  इस तरह चला जिंदगी अब वो मशाम देखते है

अजल और मुदाम हुए हमारे दिलों के ये सूफियाना अफ़साने
बदन और रूह का यह  दमाम रिश्ता अब वो पयाम  देखते है

शज़र से टूटते जर्द पत्तों को कहाँ उसकी ये हकीकत मालूम
पुरनूर हो क़मर में रंग जमाल शिहाब अब वो मक़ाम देखते है

[मुख्तलिफ-Specific, चश्में जुस्तजू- dream in eyes, 
आशना-ए-रोशनाई-ink of love, मशाम-Fragrance, शजर-tree, 
जर्द पत्तों- yellow leaves, क़याम-Stay, मुदाम/ दमाम -eternal, 
पयाम-message, क़मर-moon, शिहाब-Shooting star]

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