नादान हूँ समन्दर में तो रहा लहर नहीं देखा
पीता रहा इस तरह उम्र भर खुमर नहीं देखा
पीता रहा इस तरह उम्र भर खुमर नहीं देखा
पसीने से लथपथ होकर पहुँचा था विस्तर पे
बिताया रात फलक के नीचे क़मर नहीं देखा
रोजमर्रा में शिकस्त कैसे हो नगीनों पे नज़र
दिन कटें सदफ़ के बाज़ार में गुहर नहीं देखा
तेरे इश्के जूनूनीयत का आग यूँ लगा दिल में
आतिस के दरम्यान रहते हुए शरर नहीं देखा
तेरी नज़रों में खोया कितने नज़रों का नज़र
नज़रों में बसा उन नज़रों का हुनर नहीं देखा
मसरूफ थे मंजिल के याद में डगर नहीं देखा
गुजरा अपना कारवां पहर दो पहर नहीं देखा
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें