रविवार, 8 अगस्त 2021

खोया-पाया

हम मंजिलों के तलाश में इस कदर बेहोश हुए हैं
गरचे कुछ जो मकाँ थे वो अब हमसे छूट गए हैं

किसने क्या खोया क्या पाया इसका हिसाब नहीं
वैसे भी अब ये सब सोचने का वक़्त बीत गए हैं

शहरवाले पहले से अपने अपने दरबों में थे कैद
अनजान परिंदों का क्या वह भी अब घूट गये हैं

बाकई में कस्बों की कभी नही थीं ऐसी में फितरत
लेकिन कस्बों के बाशिंदे भी महंगाई से लूट गये हैं

गाँववाले भी सीख गए हैं अब हर वो तमाम इल्म
शहरों की तरह गांव में दिलों के  रिश्ते टूट गए हैं

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