शनिवार, 11 सितंबर 2021

हिज़्र के दिन

 तुझसे कभी कभी छुप के मिलने के चर्चे अब सरेआम हो गए हैं।
मिलते हैं हम तुम लेकिन कितनों के दिल कत्ले आम हो गए हैं।

अमीनाबाद के गलियों में गुजारे हुए वो दो चार बेशकीमती लम्हें
तेरे हिज़्र में वो चन्द  हसीन लम्हें अब सालों में तमाम हो गए है।

भटक रही है किस क़दर मेरी राहे सिम्त ऐशबाग वा चारबाग में
मंजिले आलम की बात क्या कहें अब वो भी मक़ाम हो गए हैं।

मिल से गयें है मुख्तलिफ हमारे सितारों का चलन इस कहकशां में
जुदाई में दिन अब तो सहर की तरह और शब भी शाम हो गए हैं

नहीं भाता आजकल गंज और चौक के वो लजीज़ आबोदाना
गोमती के वादियों के आब की तासीर भी नायाब ज़ाम हो गए है


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