सोमवार, 13 सितंबर 2021

दास्ताने दिल्ली

दिलबर हम दिल है दिल्ली है हर दिलजान है
गुरबत में या शोहरत में यहीं मेरी पहचान है

अरावली के दामन में छुपा हुआ है कितने राज़
यमुना के अनवरत सफ़र में कैद मेरी जान है

सदियों से बिछती है सियासत की विसात यहीं
तुग़लक़ मुग़ल अंग्रेजों की भी यहीं श्मशान है

छुप न सका सूरत मेरी जुल्म और  सितम से
तंगहाली में भी मिट न सका मेरी निशान हैं

सीने में बदस्तूर बसते रहें कारवां दर कारवां 
जर्रे जरा में जज्ब यहीं मेरी इश्के ईमान है

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें