मंगलवार, 21 मार्च 2023

मोहब्बत का ज्वर

मैं तेरे मोहब्बत का ज्वर ही सही
निबाह लो भले इक क़हर ही सही
 
चढ़ न सका ये बला पहले शायद 
जिंदगानी का ढलता पहर ही सही

पी लीजिये अश्कों के दो चार जाम
कभी दवा समझकर ज़हर ही सही 
 
बनता हूँ बिखरता हूँ रेत पानी में
साहिल ढूंढता इक लहर ही सही

सहरा में आब तलाशती जर्द चश्म  
आब या सराब का असर ही सही

गुजर गए उलफ़त के नूरानी रातें 
'शिहाब' आग नहीं शरर ही सही 

[ज्वर- Fever, क़हर- calamity ,  साहिल - shore , 
जर्द चश्म- hawk 's  eyes , सराब -mirage , 
शिहाब-Flame , shooting  star ,  शरर- spark]

बुधवार, 25 जनवरी 2023

ईदे जम्हूरियत

ये जश्ने जम्हूरियत है ये ईदे जम्हूरियत है
अमृतकाल से गुजरता हमारी तरबियत है
 
मिटा न सके तहजीब वो जुल्मों सितम से
सदियों में बनी हमारी ऐसी शख्शियत है
 
बसी है ये जमीं हर मजहब के लोगों से
जर्रे जर्रे में राम दिलों में रूहानियत है
 
सींचा हैं पुरखों ने जिसे अपने कतरों से
हिन्दे आईन हम सब की मिल्कियत है
 
करते शाद वतन तीन रंगों के कफ़न से
दिलों में तपिस आँखों में मासूमियत है
 
रुतबा तय नहीं होता अब दीन या लहू से
हमारे मुल्क़ में हर इंसा की अहमियत है
 
आबाद है मगरिब मशरिक मेरी नश्लों से
छाया हूँ दुनिया में मेरी ऐसी सलाहियत है

शनिवार, 13 अगस्त 2022

जश्ने आज़ादी

ये जश्ने आज़ादी है ये ईदे आज़ादी है
अमृतकाल में झूमता हिन्दे आबादी है

जन गण मन गा रहा सारा जमाना है
आँखों में उम्मीदें है राहें नौ ईरादी है

गंगा यमुनी माटी की ये नई फसल है 
फितरत में जुनून है सीना फौलादी हैं 

केशरिया ईमान है अरमां में सादगी है 
हरे भरे चमन की खुशबू बेमियादी है 

लहरा रहा मुल्क में घर घर में तिरंगा है
दिलों में आज़ादी है लबों पे आज़ादी है

बुधवार, 26 जनवरी 2022

नाज़े जम्हूरियत

होंठों पे कौमी तराने हरदिल में ईमान रखते हैं, 
हमवतन सर पे कफ़न हाथों में जान रखते हैं।

फिरंगी हुकूमत बनकर रह गई तारीख़ के पन्ने
खुदमुख्तारी के दौर में हम एक आईन रखते हैं

लहू के मीरास में न रहा सियासत का ओहदा
आम अवाम सदर बनने  का अरमान रखते हैं।

अलहदा मज़हब जुबान और रिवायत हमारी 
लेकिन हर दिल में एक ही हिंदुस्तान रखते हैं

फख्र है जमहूरियत के सालगिरह के जश्न का
हर दिल व मंजिल पे तिरंगा का निशान रखते हैं

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

आँखे चार

एक बार आंखों से आंखे चार कीजिये।
बन जाऊंगा हमसफ़र एतवार कीजिये।

मिट ही जाएंगी फासलें हमारे रास्तों की 
एक दफा मेरी जानिब अबसार कीजिये।

रफ्ता रफ्ता क़दम बढ़ायें मकां की तरफ
होगी अपनी मंजिल एक इक़रार कीजिये।

तेरे रुखसार में कितने नूरानी गुल खिलेंगे
अपने जलवों से ये गुंचा गुलज़ार कीजिये।

बनते नहीं अव्वल झरोखें आशियाने में
बुनियाद बन ही रही है इंतज़ार कीजिए।

सोमवार, 27 दिसंबर 2021

लम्हां लम्हां

एक दिन ये बेमियादी शब गुज़रे
आरजू है खुदा ये ब-सबब गुज़रे

ख्वाहिश नहीं सालों में बसर की
दो चार दिन सही बा अदब गुज़रे

सहर की चाह में मुन्तज़िर दिल
फुरसत के सानिया गज़ब गुज़रे

ख़ुशी में हो चाहे ग़म में परेशान
तेरी निगाहों में कुछ अजब गुज़रे

गुजिस्ता सालों से उम्दा गुजरें
इमसाल में अरबों खरब मिले 
 
अबकी दफा नए साल में दोस्त
लम्हां लम्हां फ़र्त-ए-तरब गुज़रे


शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

रिश्तें

जो हैं नहीं उसे देखने की हसरत नहीं
जागीर कभी था इसका गफ़लत नहीं

शबीह दिल में बसा कर रखा है दोस्त
चुनाँचे बार बार देखने की फुरसत नहीं

दरम्यां भले हजार कोस की बन गयी है
अब ये ना कहना कि मुझे उल्फ़त नहीं

रिश्तों के जंजीर की तासीर ऐसी होती 
रोज रोज आजमाने की खसलत नहीं
  
होने का अहसास ही बहुत है सदीक 
गौर देखिये ये दुनिया क्या जन्नत नहीं