शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

खूबसूरत जिंदगानी

गुलों से खूश्बू व झरनों से मौज़ चुराकर देखिये।
इल्तज़ा है तितलियों के रंगों में नहाकर देखिये।

जन्नत की ख्वाहिश में बिता दी हमनें ये उम्र
खूबसूरत है हर लम्हा उसमें उतरकर देखिये।


अंधेरे के साये में क्यों करते हो जाया जिंदगानी
धूप कितनी सुनहरी है उसमें ठहरकर देखिये।

शिक़वे-शिकायत में आज गुमराह इंसानियत
मिलेंगें दोस्त रकीबों के शहर में खोजकर देखिये।

बेबजह गिला व रंजिसे ना रखिये सीने में हुज़ूर
बिखरेगी नूर मेरी आँखों में जरा बसकर देखिये।

शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

रंगो के तिलिस्म

मगरिब में ढलते रंगो के तिलिस्म में खनक किसका है
ये उड़ते रंगो के सैलाब के  जिस्म में धनक किसका है

कोयल की कूक या आबे बहिश्त से निकलती ये तान
मौशिकी और फ़िज़ां के मक़ामात में झनक किसका है

फ़िज़ां के रुखसार में या अब्र में लिपटी ये चम्पई लेप
रंगो के इस बाजार के कारोबार का भनक किसका है

शहाब के ज़जीरे में नायब रंगों का ये लाज़बाब रक़्स
रूहानी तराने व् दिलक़श बंदिश में छनक किसका है

ये कौन सा रंगसाजी या मुसब्बिर की नामचीन शबीह
शिहाब उफ़क के रुख को रंगने का सनक किसका है 

मंगलवार, 24 सितंबर 2019

अफ़साने

मुख्तलिफ थी कल तक हमारे अफ़साने अब वो तमाम देखते हैं
कल तक चश्में जुस्तजू थी दो  दिलों की अब वो अवाम देखते है

सहर से शामे तलक सीने में उभरता रहा आशना-ए-रोशनाई 
सुर्ख हुए चश्म-ए-समंदर की गहराई, अब वो कलाम देखते हैं



जन्नत की खातिर तिनका तिनका बिखेरा उम्र भर  गुलिश्तां में 
दो गज़ का नशेमन बनाऊं कैसे जान अब  वो क़याम देखते है

अबीर की खवाहिश लिए लूटा दी बहार-ए-गुलशन की खुशबू
खिजां का दौर  इस तरह चला जिंदगी अब वो मशाम देखते है

अजल और मुदाम हुए हमारे दिलों के ये सूफियाना अफ़साने
बदन और रूह का यह  दमाम रिश्ता अब वो पयाम  देखते है

शज़र से टूटते जर्द पत्तों को कहाँ उसकी ये हकीकत मालूम
पुरनूर हो क़मर में रंग जमाल शिहाब अब वो मक़ाम देखते है

[मुख्तलिफ-Specific, चश्में जुस्तजू- dream in eyes, 
आशना-ए-रोशनाई-ink of love, मशाम-Fragrance, शजर-tree, 
जर्द पत्तों- yellow leaves, क़याम-Stay, मुदाम/ दमाम -eternal, 
पयाम-message, क़मर-moon, शिहाब-Shooting star]

शनिवार, 7 सितंबर 2019

कमर भी शरमा गया

हिन्द का नूरे बरात देख कल कमर भी शरमा गया।
सजाया विक्रम का जो सेहरा उसका गला भर गया।
सहर में कौतूहल में थे हिन्द के दानिश फ़रिश्ते,
फैसले की घड़ी में हमारा विक्रम से रiफ्ता टूट गया।


खोजी कारवां चला था बर्फ़ीली वादियों के जानिब,
मक़ाम हासिल न सही तिरंगा का निशा छोड़ आया।
गुमां है  सबसे किफायती था अपना सफ़र हमारा,
दूर से चांद को घूमने के लिए सियारा छोड़ आया।
फ़ज़ा में नए इल्मी शाख फिर नुमायां होंगे शहाब,
माहताब क्या  कहकशां में जाने का करार आया

चंद्रयान 2

नई तरह से चलो चाँद को घूमें
फिर से चलो हम चाँद को चूमें

तेरी सतही पानी,कण-कण में
नवीन बोध से उसमें हम झूमें

विक्रम ध्रुव में पग रखने को है
आज चल चन्द्र चट्टानों को चूमें


बर्फीली घाटी में जीवन का शोध
प्रज्ञान सजग व मद्र चाल से घूमें


तिरंगा को श्वेत आभा में लहराये
रजनी के आँचल में नाचे और झूमें

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

फसल

आप मीठे ख्याली खेतों की इक फसल हो 
या सांसों से उपजी हुयी इक ग़ज़ल हो 

वक़्त गुजरेंगे जैसे हाथों से फिसलते रेत

लेकिन रगों में दौड़ने वाली तुम जल हो 

तराने गूजेंगे जैसे पंचम से निकलते गीत 

आप खुद में ही  मिसरा ऐ बेमिसाल हो

धनक में ना समाने वाली इक रंग नायाब 

आप जिस्म और जेहन से परे ख्याल हो 

महताब की दमकते नूर क्या औकात 

आप कहकशाँ में शिहाब-ए-जमाल  हो 

[धनक-Rainbow, जेहन -Mind, महताब - Moon, 
कहकशाँ - Galaxy, शिहाब - Shooting star, 
जमाल-Charm/beauty]

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018

हयात


बसंती बयार में  इतराते गुलों की हस्ती तमाम होती है  
मौसमें बहार ही नहीं पतझर के दिन भी सतरंगी होती हैं

शरारे शमा  में मचलते बहकते परवाने को कहाँ मालूम
रूह-जिस्म का बाबस्ता कितना इक दिन ये फ़ना होती है

हाथ से फिसलते गिरते रेत की तरह उम्र को कहाँ मालूम
लिबास बदलने में गुज़री इक दिन हयात भी अजल होती है

वक़्त के मारे कराहते बिलखते दर्देदिल को कहाँ मालूम
खिजां  व बहार की तरह हर गम की इक इंतिहा होती है

खिजां में  शाख से  टूटते बिखरते पत्तिओं को कहाँ मालूम
कायनात में कब तक शिहाब  रात की इक सहर होती है