शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

बेताबी

बेसब्र हूँ फिर से हसीन महताब तुम्हें चूमने को
बेताब हूँ तेरी जमीन पे दो चार कदम घूमने को  

हौसला भी साथ दुआ भी है हिन्द के अव्वाम का 
कारवां तैयार है सफर लाख मीलों की करने को 

राहें भटक गयी थी लेकिन इरादे है बुलंद अपनी 
चार साल से बेचैन हूँ दिलबर फासले मिटाने को  

मक़ाम पार करता हुआ पहुंचा हूँ तेरी जुस्तजू में
दर दस्तक दे रहा हूं क़मर तुझसे रूबरू होने को

हो गयी खतम हिज़्र की रातें  इंतज़ार के लम्हें 
बेकरार हूँ अब आग़ोश में दो हफ़्ता बिताने को

रविवार, 9 जुलाई 2023

आसमानी रंग

दीनदारी को समझना भी एक जंग है
जुदा राहें कोई साहिब कोई मलंग है

ज़र्रे ज़र्रे में भी नज़र आ जाता है खुदा
देखने का सबका अपना अपना ढंग है

जौहरी के लिए बेशकीमती जवाहिर
तो किसी बहशी के लिये सिर्फ संग है

जिसने जाना वह कभी जान न पाया
ईल्म नहीं लेकिन सोच कितनी तंग है

तरन्नुम में साँसे शम्स भी क़मर भी 
अजीब करामात देखकर सब दंग है

जो पिया वह प्यासा न पिया वह भी
कुछ होते बेहोश न जाने कैसा भंग है

नज़र आता नहीं  सुर्ख़, सब्ज़, जर्द 
जेहन में चढ़ा कौन आसमानी रंग है

झीलमिल हसरतें

तेरी इन निग़ाहों में मंजिल रख गए
तेरी सांसों में हम जां दिल रख गए

सुर्ख़ लबों को चुमने की बेताबी में
रुख पर आशना के तिल रख गए

स्याह घनेरे गेसुओं की जंजीरों में 
काली घटा ने अपने ज़िल रख गए 

हुए दीवाने कितने तेरी सोहबत में
शायर भी अपनी शेरदिल रख गए

हुए हैं अपने सितारों का चलन एक
नैनों में हसरतें झिलमिल रख गए

मंगलवार, 21 मार्च 2023

मोहब्बत का ज्वर

मैं तेरे मोहब्बत का ज्वर ही सही
निबाह लो भले इक क़हर ही सही
 
चढ़ न सका ये बला पहले शायद 
जिंदगानी का ढलता पहर ही सही

पी लीजिये अश्कों के दो चार जाम
कभी दवा समझकर ज़हर ही सही 
 
बनता हूँ बिखरता हूँ रेत पानी में
साहिल ढूंढता इक लहर ही सही

सहरा में आब तलाशती जर्द चश्म  
आब या सराब का असर ही सही

गुजर गए उलफ़त के नूरानी रातें 
'शिहाब' आग नहीं शरर ही सही 

[ज्वर- Fever, क़हर- calamity ,  साहिल - shore , 
जर्द चश्म- hawk 's  eyes , सराब -mirage , 
शिहाब-Flame , shooting  star ,  शरर- spark]

बुधवार, 25 जनवरी 2023

ईदे जम्हूरियत

ये जश्ने जम्हूरियत है ये ईदे जम्हूरियत है
अमृतकाल से गुजरता हमारी तरबियत है
 
मिटा न सके तहजीब वो जुल्मों सितम से
सदियों में बनी हमारी ऐसी शख्शियत है
 
बसी है ये जमीं हर मजहब के लोगों से
जर्रे जर्रे में राम दिलों में रूहानियत है
 
सींचा हैं पुरखों ने जिसे अपने कतरों से
हिन्दे आईन हम सब की मिल्कियत है
 
करते शाद वतन तीन रंगों के कफ़न से
दिलों में तपिस आँखों में मासूमियत है
 
रुतबा तय नहीं होता अब दीन या लहू से
हमारे मुल्क़ में हर इंसा की अहमियत है
 
आबाद है मगरिब मशरिक मेरी नश्लों से
छाया हूँ दुनिया में मेरी ऐसी सलाहियत है

शनिवार, 13 अगस्त 2022

जश्ने आज़ादी

ये जश्ने आज़ादी है ये ईदे आज़ादी है
अमृतकाल में झूमता हिन्दे आबादी है

जन गण मन गा रहा सारा जमाना है
आँखों में उम्मीदें है राहें नौ ईरादी है

गंगा यमुनी माटी की ये नई फसल है 
फितरत में जुनून है सीना फौलादी हैं 

केशरिया ईमान है अरमां में सादगी है 
हरे भरे चमन की खुशबू बेमियादी है 

लहरा रहा मुल्क में घर घर में तिरंगा है
दिलों में आज़ादी है लबों पे आज़ादी है

बुधवार, 26 जनवरी 2022

नाज़े जम्हूरियत

होंठों पे कौमी तराने हरदिल में ईमान रखते हैं, 
हमवतन सर पे कफ़न हाथों में जान रखते हैं।

फिरंगी हुकूमत बनकर रह गई तारीख़ के पन्ने
खुदमुख्तारी के दौर में हम एक आईन रखते हैं

लहू के मीरास में न रहा सियासत का ओहदा
आम अवाम सदर बनने  का अरमान रखते हैं।

अलहदा मज़हब जुबान और रिवायत हमारी 
लेकिन हर दिल में एक ही हिंदुस्तान रखते हैं

फख्र है जमहूरियत के सालगिरह के जश्न का
हर दिल व मंजिल पे तिरंगा का निशान रखते हैं