बेसब्र हूँ फिर से हसीन महताब तुम्हें चूमने को
बेताब हूँ तेरी जमीन पे दो चार कदम घूमने को
हौसला भी साथ दुआ भी है हिन्द के अव्वाम का
कारवां तैयार है सफर लाख मीलों की करने को
राहें भटक गयी थी लेकिन इरादे है बुलंद अपनी
चार साल से बेचैन हूँ दिलबर फासले मिटाने को
मक़ाम पार करता हुआ पहुंचा हूँ तेरी जुस्तजू में
दर दस्तक दे रहा हूं क़मर तुझसे रूबरू होने को
हो गयी खतम हिज़्र की रातें इंतज़ार के लम्हें
बेकरार हूँ अब आग़ोश में दो हफ़्ता बिताने को