गांव और देहात अब मेरे लिए एक नाम रह गया है
करवां का मकाम ढूंढना ही सिर्फ काम रह गया है
करवां का मकाम ढूंढना ही सिर्फ काम रह गया है
सफर तो शुरू किया था तुम्हारे बगल के चरपाई से
यादों के झरोखें में उस चारपाई का फाम रह गया है
वह छोटा सा कमरा दिल्ली के एक तंग मुह्हले की
कभी कभी गुदगुदाती वो मजलिसे शाम रह गया है
झरोखों से उन तंग गलियों में उसे बार बार झाँकना
वो निगाहें की शोखी वो अफ़साने आम रह गया है
आँखों में उन सपनों का हर रोज बनता टूटता महल
यादों में हमारे दो चार घुट पीये हुए जाम रह गया है

