सोमवार, 24 जुलाई 2023

अमन का पयाम

अमन से सजाके एक पयाम लाया हूँ।
हिन्द से तेरे लिये एक सलाम लाया हूँ।

हर गुलशन में खिले रंग बिरंगे कलियाँ  
सरहदों पे यारी का एक पैगाम लाया हूँ 

बर्बाद होते हैं आशियाने हर यलगार में, 
खत्म हो रंजिशे ऐसा एक क़याम लाया हूँ 

आलमी कुनबा फ़लसफ़ा के हम वारिस 
फ़हमदारी का नया एक कलाम लाया हूँ 

हमारे नयनों में फिर से पुरनूर हो बहार 
शिहाब सुकूं से भरा एक मकाम लाया हूँ

रविवार, 16 जुलाई 2023

पिघलता दिल

देखकर तेरी शोख अदा दिल मचलने लगा है
तेरी आँखों के स्याही में दिल पिघलने लगा है

तेरी बोली के संगत में कोयल कुहूकने लगा है 
देखकर तुझे अब गुलों का रंग बदलने लगा है

तेरे आने की ख़बर सुन भंवरे बहकने लगा है
तेरे चन्दन सा बदन से फजाएँ महकने लगा है 

काली घटा की रंगत जुल्फों में निखरने लगा है 
ज़ुल्फों का तेवर ये देख सावन पसीजने लगा है

उमंग भरे दिल के परिन्दें अब चहकने लगा है
तेरे ईश्क में रोम रोम से तराने निकलने लगा है

शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

बेताबी

बेसब्र हूँ फिर से हसीन महताब तुम्हें चूमने को
बेताब हूँ तेरी जमीन पे दो चार कदम घूमने को  

हौसला भी साथ दुआ भी है हिन्द के अव्वाम का 
कारवां तैयार है सफर लाख मीलों की करने को 

राहें भटक गयी थी लेकिन इरादे है बुलंद अपनी 
चार साल से बेचैन हूँ दिलबर फासले मिटाने को  

मक़ाम पार करता हुआ पहुंचा हूँ तेरी जुस्तजू में
दर दस्तक दे रहा हूं क़मर तुझसे रूबरू होने को

हो गयी खतम हिज़्र की रातें  इंतज़ार के लम्हें 
बेकरार हूँ अब आग़ोश में दो हफ़्ता बिताने को

रविवार, 9 जुलाई 2023

आसमानी रंग

दीनदारी को समझना भी एक जंग है
जुदा राहें कोई साहिब कोई मलंग है

ज़र्रे ज़र्रे में भी नज़र आ जाता है खुदा
देखने का सबका अपना अपना ढंग है

जौहरी के लिए बेशकीमती जवाहिर
तो किसी बहशी के लिये सिर्फ संग है

जिसने जाना वह कभी जान न पाया
ईल्म नहीं लेकिन सोच कितनी तंग है

तरन्नुम में साँसे शम्स भी क़मर भी 
अजीब करामात देखकर सब दंग है

जो पिया वह प्यासा न पिया वह भी
कुछ होते बेहोश न जाने कैसा भंग है

नज़र आता नहीं  सुर्ख़, सब्ज़, जर्द 
जेहन में चढ़ा कौन आसमानी रंग है

झीलमिल हसरतें

तेरी इन निग़ाहों में मंजिल रख गए
तेरी सांसों में हम जां दिल रख गए

सुर्ख़ लबों को चुमने की बेताबी में
रुख पर आशना के तिल रख गए

स्याह घनेरे गेसुओं की जंजीरों में 
काली घटा ने अपने ज़िल रख गए 

हुए दीवाने कितने तेरी सोहबत में
शायर भी अपनी शेरदिल रख गए

हुए हैं अपने सितारों का चलन एक
नैनों में हसरतें झिलमिल रख गए

मंगलवार, 21 मार्च 2023

मोहब्बत का ज्वर

मैं तेरे मोहब्बत का ज्वर ही सही
निबाह लो भले इक क़हर ही सही
 
चढ़ न सका ये बला पहले शायद 
जिंदगानी का ढलता पहर ही सही

पी लीजिये अश्कों के दो चार जाम
कभी दवा समझकर ज़हर ही सही 
 
बनता हूँ बिखरता हूँ रेत पानी में
साहिल ढूंढता इक लहर ही सही

सहरा में आब तलाशती जर्द चश्म  
आब या सराब का असर ही सही

गुजर गए उलफ़त के नूरानी रातें 
'शिहाब' आग नहीं शरर ही सही 

[ज्वर- Fever, क़हर- calamity ,  साहिल - shore , 
जर्द चश्म- hawk 's  eyes , सराब -mirage , 
शिहाब-Flame , shooting  star ,  शरर- spark]

बुधवार, 25 जनवरी 2023

ईदे जम्हूरियत

ये जश्ने जम्हूरियत है ये ईदे जम्हूरियत है
अमृतकाल से गुजरता हमारी तरबियत है
 
मिटा न सके तहजीब वो जुल्मों सितम से
सदियों में बनी हमारी ऐसी शख्शियत है
 
बसी है ये जमीं हर मजहब के लोगों से
जर्रे जर्रे में राम दिलों में रूहानियत है
 
सींचा हैं पुरखों ने जिसे अपने कतरों से
हिन्दे आईन हम सब की मिल्कियत है
 
करते शाद वतन तीन रंगों के कफ़न से
दिलों में तपिस आँखों में मासूमियत है
 
रुतबा तय नहीं होता अब दीन या लहू से
हमारे मुल्क़ में हर इंसा की अहमियत है
 
आबाद है मगरिब मशरिक मेरी नश्लों से
छाया हूँ दुनिया में मेरी ऐसी सलाहियत है