मुस्तकविल
तेरी शोख नज़रों में
मेरे मुस्तकविल का नूर है
एक साथ है सफ़र में
फ़िर भी ये मंजिल दूर है
तेरी सुर्ख लवों में
मेरी अव्वल ग़ज़ल माअमूर है
रूह रूबरू है ज़ुहर में
फ़िर भी ये महफ़िल बेनूर है
तेरे पाक दामन में
मेरा एक साहिल जरूर है
एक सैलाब है ज़िगर में
फ़िर भी ये दिल मजबूर है
तेरे नूरानी रुखसार में
मेरे पल पल का तसब्बुर है
शरारा है ज़मीर में फ़िर भी
ये संगदिल मशहूर है
तेरे नफ़स-नफ़स में
मेरी अज़ल का सरूर है
महताव है सहर में
फ़िर भी ये शिहाब मसरूर है
सितम्बर २००६ में रचित
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