रविवार, 25 जनवरी 2009

मुस्तकविल

मुस्तकविल

तेरी शोख नज़रों में 
मेरे मुस्तकविल का नूर है
एक साथ है सफ़र में 
फ़िर भी ये मंजिल दूर है 

तेरी सुर्ख लवों में
मेरी अव्वल ग़ज़ल माअमूर है 
रूह रूबरू है ज़ुहर में 
फ़िर भी ये महफ़िल बेनूर है 

तेरे पाक दामन में 
मेरा एक साहिल जरूर है 
एक सैलाब है ज़िगर में 
फ़िर भी ये दिल मजबूर है 

तेरे नूरानी रुखसार में 
मेरे पल पल का तसब्बुर है 
शरारा है ज़मीर में फ़िर भी 
ये संगदिल मशहूर है 

तेरे नफ़स-नफ़स में 
मेरी अज़ल का सरूर है 
महताव है सहर में 
फ़िर भी ये शिहाब मसरूर है

सितम्बर २००६ में रचित

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें