शनिवार, 17 जुलाई 2021

अल्फाज़

शायद मैं चन्द अल्फाज़ हूँ मेरा  कोई मकां नहीं
फैल जाता हूँ स्याही की तरह जिसकी इंतहां नहीं

कितने नायाब हरफ़ सजा रखें अपनी गुलशन में
कैसे बताऊं इसे अपने रूप का कोई गुमां नहीं

धीरे धीरे मेरा वजूद घुल जाता हैं इन्हीं फजाओं में
मेरे सिम्त की कोई सरहद नहीं कोई निशान नहीं

किसके जानिब अपनी अल्फ़ाज़ों का रूख करूँ
जिसकी मुक़्क़मल जमीन नहीं कोई आसमां नहीं 

मरासिम है हिंदवी से कभी रेख़्ता से कभी उर्दू से
इन चंद अशआर के सीवा मेरी कोई ज़ुबान नहीं 
  
भटकता हूँ कभी गंगा कभी सिंधु के वादिओं में 
बेपनाह तिश्नगी का अनवरत सफर आसान नहीं

शनिवार, 15 मई 2021

ज़मीर के सौदागर

हिन्दे हयात अब सिर्फ इक घोंसला बनकर रह गया है,

हमवतनों का जान सिर्फ यहाँ हौसला बनकर रह गया है।


वुहानी के दौर में ज़मीर का सिलसिलेवार हो रहा सौदा,

इंसानियत के बिना जिस्म खोखला बनकर रह गया है।


दवा दारु व हवा की खोज में दर व दर भटकते क़दम,

हाँफती सांसों में जान उड़न खटोला बनकर रह गया है।


सियासतदां से भी बदतर अनेक बाज बैठे हैं ताक में,

हर नफ़्स इन शिकारियों का चोंचला बनकर रह गया है।


शिफाखाने से श्मशाने तलक हो रहा इंसानियत जार जार,

सिक्कों के चाह में चन्द शख्स दोगला बनकर रह गया है।


इन इज़ारेदारों के शोर में सहमी दबी मासूमों की जुबान

आम आदमी की आवाज अब तोतला बनकर रह गया है


रविवार, 21 मार्च 2021

लाज़बाब

पढ़ के देखो सनम खुली क़िताब हूँ 
मैं बेहद बेमिसाल और बेहसाब हूँ

चश्में हटाकर देखिए मेरी रंगत को
मैं लालासाँ लबरेज़ व लाजवाब हूँ

तनाफुस से भी खुश्बू भर जाएगी  
मैं गुल गुलबार और गुले- ख्वाब हूँ

घर कर जाऊंगा तेरी अल्फाजों में
मैं जूनूनी जांबाज़ जमीनीजनाब हूँ

फज़ाओं में शबनम के ताजग़ी में
मैं शबेसहर में शुमार शामे शराब हूँ




शुक्रवार, 19 मार्च 2021

नादानियां

नादान हूँ समन्दर में तो रहा लहर नहीं देखा
पीता रहा इस तरह उम्र भर खुमर नहीं देखा

पसीने से लथपथ होकर पहुँचा था विस्तर पे
बिताया रात फलक के नीचे क़मर नहीं देखा

रोजमर्रा में शिकस्त कैसे हो नगीनों पे नज़र 
दिन कटें सदफ़ के बाज़ार में गुहर नहीं देखा

तेरे इश्के जूनूनीयत का आग यूँ लगा दिल में
आतिस के दरम्यान रहते हुए शरर नहीं देखा

तेरी नज़रों में खोया कितने नज़रों का नज़र
नज़रों में बसा उन नज़रों का हुनर नहीं देखा

मसरूफ थे मंजिल के याद में डगर नहीं देखा
गुजरा अपना कारवां पहर दो पहर नहीं देखा

गुरुवार, 18 मार्च 2021

प्यम्बर

डूबा दूँ दरिया के प्यास को समंदर बनना चाहता हूँ

सोख लूँ नमी हर आँखों से कलंदर बनना चाहता हूँ

 

दोस्तों से ही दिलदारी करते हुए पाया हूँ जमाने को 

जीत लूँ दिल दुश्मनों का सिकन्दर बनना चाहता हूं

 

मिलें सबोंको अपने दिल का साथी इस अंजुमन में 

आबाद कर दूं नशेमन को स्वयंवर बनना चाहता हूँ

 

हर शख्स है परेशान कभी जलजलों कभी सैलाब में 

मिटा दूं सालभर की रंजिशे नवम्बर बनना चाहता हूँ 

 

पयाम सुनकर बेबसों के रूख पर जाये हलचल

झूला दूं लबों पर मुस्कुराहट प्यम्बर बनना चाहता हूँ


रविवार, 31 जनवरी 2021

जिंदगी की राह

कहकशां में हर सितारों पे नज़र रखते हैं
जिंदगी तेरी राहों पे जारी सफर रखते हैं

दिलों में तेरी अक्श व लबों पर तेरा नाम
सुबहो शाम और पहर दो पहर रखते है

जुगनुओं से कह दो कि रहे वो औकात में 
दिल में शोला व निगाहों में शरर रखते है 

मंजर और पसमंज़र दोनों है निगाहों में
चमन क्या वो सहरा में भी शज़र रखते है

नेकी की राह में फ़िदा है तुम पर सनम
दिन व रात तेरी जलवों में असर रखते है

मगरिब मशरीक में जहाँ भी हो नुमाया 
पल पल वो तेरी सेहत की खबर रखते हैं 

आब आतिश फ़ज़ाओं में वो दम कहाँ 
हर सूरत में हम अपना खिज़र रखते हैं

जिंदगानी के वास्ते सरमाये हो तंग जितने 
हाथों में फुलूस नहीं जान जिगर रखते हैं 

परवाज़ लगाते हैं परिंदों जैसे फलक में 
सज़र की तरह मिटटी में जज़र रखते हैं
 
तकरीर करने का कहाँ इल्म नहीं मालूम 
ढाई आखर में कहने का हुनर रखते हैं 

कहकशां (Universe) शरर (Spark/gleam) 
जलवों (Show/splendor) मगरिब (West) 
मशरीक (East) खिज़र (Immortality ) 
फुलूस (Penny/Medieval coin ) जज़र (root) 
तकरीर (Speech) इल्म/हुनर  (Knowledge) 


शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

चर्चा

हसीं रुखसार में शबनमी आब मिलतें है 
चर्चा है तेरे लबों पे सुर्ख गुलाब मिलते हैं

फलक झुक जाता है अपनी घटा लेकर
चर्चा है तेरे जुल्फों में स्याह सहाब मिलते हैं

साजिन्दगी करती है कोयल तेरी बातों से 
चर्चा है तेरे सांसों में ताने रुबाब मिलते है

चलती फिरती मयखाना है तेरी नम आँखे 
चर्चा है तेरे चश्मों में सफ़ेद शराब मिलतें हैं

सिजदा करतें हैं इस शहर के मासूम दीवाने
चर्चा है तेरे कूचों में इश्के किताब मिलतें हैं

कभी न गया कोई मायूस इस कशाने से 
चर्चा है तेरे दर पे माकूल हिसाब मिलते हैं

मुजरिम हो जाते हैं बरी हर इल्ज़ाम से 
चर्चा है तेरे सोहबतों में सवाब मिलते हैं

तिलिस्मी समा डूब जाता है आगोश में
चर्चा है तेरे महफ़िल में सराब मिलतें हैं