अमन के परचम लहराते है हमारे लोग
तारीख़ गवाह है कभी यलगार नहीं करते
तारीख़ गवाह है कभी यलगार नहीं करते
कुदरती सरमाये से लबरेज हमारी जमीं
इसलिए हम मौत का कारोबार नहीं करते
बेपनाह ख्वाहिशें न रखते हमवतन मेरे
बेवजह कन्धों को चार चार नहीं करते
जो आया समा गया इस हसीं दरिया में
हम लुटेरों का भी तिरस्कार नहीं करते
सदियों से अपनी हदों में रहने वाले कौम
बेमतलब सरहदों का विस्तार नहीं करते